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जिम कार्बेट नेशनल पार्क, नैनीताल, उत्तराखंड

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सुप्रभात मित्रों, स्वागत है आपका हमारे जीवन पथ पर|
अब मै आप सभी को अपने साथ नैनीताल, उत्तराखंड ले चल रहा हूँ, जहाँ कुछ महीने पहले मै दोस्तों के साथ घूमने गया था| बात अप्रैल महीने की है, गर्मी चरम पर थी| अपने कुछ मित्रो के साथ मिलकर मैने कही जाने की योजना बनाई| लेकिन प्रश्न यह था कि जाया कहाँ जाये तो एक मित्र ने नैनीताल चलने का सुझाव दीया| तो हम सबने फटाफट रेल यात्रा के लिए वातानुकूलित डिब्बे के टिकट ले लिए और 21 से 24 तक के लिये "द ग्रैण्ड" मे वातानुकूलित कमरे भी बुक कर लिये| अब बस इन्तजार था 21 अप्रैल की शाम का जब हम नैनीताल के लिए रवाना होंगे| और वह दीन भी आ गया, जब हमे नैनीताल के लिये निकलना था| हम 21 अप्रैल की दोपहर के तीन बजे एक हल्का सा बैकपैक लेकर और कुछ कपड़े, जरुरत के अन्य सामान और रास्ते के लिए खाना लेकर घर से विदा लिया| अपने छोटे भाई शिवम के साथ बाइक पर बरौत पहुँचा जहाँ से मुझे इलाहाबाद के लिये बस लेनी थी| बरौत से हमने बस ली और इलाहाबाद बस अड्डे पर पहुचे, और वहां से ऑटो रिक्शा लेकर इलाहाबाद जंक्शन पहुचे| वहाँ पहुचकर देखा तो पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार सारी म…

मेरा घर (पार्ट 2)

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नमस्कार मित्रो,

थोड़ी सी व्यस्तता के कारण चिट्ठे से अलविदा लियाथा, लेकिन अभी मेरी कविता संग्रह "मेरे मन की" के प्रकाशित होने के उपरान्त लौट आया हू और अपनी यात्रा की शुरुवात वही से करता हू जहाँ से इसे छोड़ कर गया था|



पोस्ट क्रमांक - ६ -:- मेरा घर  से आगे ...
और आंगन के अंदर दो पेड़ थे। सबसे पहले अमरूद था और दूसरा आँवले का था। और, मवेशियों के लिए एक बड़ा खपरैल था, उस समय दो गायों और तीन भैंस थी जो उसी मे रहा करती थी| और एक चार कमरे की दालान थी, उनमें से तीन स्टोर रूम के रूप में इस्तेमाल किया गया था और एक का इस्तेमाल भूसे, उपले और लकड़ी के लिए रखने के लिये करते थे। और दालान के पीछे एक छोटी सी नदी थी, जो गर्मियो मे तो सुखी रहती थी, लेकिन बारिश मे पानी इकट्ठा हो जाता था| और उस पानी का उपयोग लोग अपने पशुओ को नहलाने, उनको पानी पिलाने, बर्तन-कपड़े इत्यादी धोने के काम मे लाते थे| घर के सामने एक गेस्ट रूम के नाम पर चारो तरफ से खुला हुआ खपरैल था जो एक बड़ी सी नीम के पेड़ के नीचे था| गर्मियो के दोपहर तो हम सभी लोग उसी खपरैल मे बिताते थे| और जो सुख और आनंद की अनुभूती उस खपरैल मे बैठकर म…

मेरे मन की

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मेरी पहली पुस्तक "मेरे मन की" की प्रिंटींग का काम पूरा हो चुका है | और यह पुस्तक बुक स्टोर पर आ चुकी है| आप सब ऑनलाइन गाथा के द्वारा बुक कर सकते है| मेरी पहली बुक कविताओ और कहानीओ का अनुपम संकलन है| 
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मेरा घर

जैसा की मैंने आपको बताया, मेरा जन्म भदोही जिले के एक छोटे से गांव मोहनपुर में हुआ, जो बहुत ही सुंदर और प्रकृति से भरा है। मेरे गाँव की भौगोलिक संरचना कुछ ऐसी है की यह भदोही और इलाहबाद जिले के बिच में है | इलाहाबाद कुछ ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। यह जगह प्रयाग कुंभ मेला और कई  अन्य सांस्कृतिक विरासत अपने आप में समेटे हुए है | इसे हम तीन धार्मिक स्थानों की त्रिवेणी भी कह सकते है क्योकी हमारे निवास स्थान से प्रयाग नगरी इलाहबाद, बाबा विश्वनाथ धाम, काशी और माँ विंध्यवासिनी, मिर्जापुर की दूरी समान है, और हम इन महापावन स्थानों के केंद्र में बसते है, यह अपने आप में एक सुखदायक अनुभूती देने वाला है, हमारे आसपास तीन धार्मिक तीर्थस्थलो का संगम है | मेरा घर जो कुछ वर्षो पहले मिट्टी का था, अब कई बड़े कमरों  वाली कंक्रीट की एक बड़ी इमारत में तब्दील हो चुका है । लेकिन आज से दस वर्षो पूर्व में, तीन बड़े कमरों के साथ एक रसोईघर और एक स्नानघर था,  मेरा पूरा परीवार उसी घर में रहता था, घर में ही एक छतनुमा (जिसे हम वहां की भाषा में "कोठा" कहते थे) कमरा, जो भण्डारण हेतु उपयोग में लाया जाता था |  घ…

मेरे दादाजी

मेरा पूरा गाँव मेरे परीवार के प्रत्येक सदस्य को सम्मान की दृष्टी से देखता था, अभी भी वह सम्मान बरकरार है या नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है | लेकिन जो सम्मान मुझे भी मिलता आया है उसे मै अपनी बड़ी उपलब्धी मानता आया हूँ, (संभवतः अब यह भ्रम टूट गया है)| गाँव में सभी अपनो से बड़ो या छोटो को भी जिन्हें सम्मान देना होता है उसे "पालागी" (इस शब्द को मै अभी तक नमस्ते का समानार्थी शब्द मानता आया हूँ, लेकिन शायद इस शब्द का अर्थ निकलना मेरी सबसे बड़ी भूल होगी) कहकर संबोधित करते है | मेरे दादाजी जो उस समय ग्राम प्रधान थे जब मै पैदा भी नहीं हुआ था, उन्हें पुरे गाँव बहूत सम्मान की दृष्टी से देखता था, मेरा भ्रम भी अब जाकर टूटा की गाँव वाले मुझे सम्मान देकर दादाजी के प्रती सम्मान प्रदर्शीत करते थे |

मेरा परिवार

आज बात करूंगा परिवार के कुछ सदस्यों के बारे में जिन्हें मै चाहकर भी भुला नहीं सकता मेरा परिवार जिसमे मै भारत देश की एकता और अखंडता को वीद्दमान पाता हूँ, मेरा परिवार एक संयुक्त परिवार है जो भारत में ख़त्म होने की कगार पर है, और मै भारत वर्ष के लोगो से इसके संरक्षण हेतु आगे आने का आह्वान करता हूँ | मेरे तीन दादाजी और उनका पूरा परिवार, हम सभी एक साथ एक ही घर में रहते है | और शायद इसे एकीकृत और संयुक्त परिवारों के लिए ही हमारे पुर्वाजो ने परिवार शब्द का इस्तेमाल किया था| लेकिन शायद अब सभी परिवार शब्द के मूल आर्थ को ही भूल गएँ है, अरे जिस परिवार में दादा-दादी का प्यार, चाचा-चाची और अन्य सदस्यो का दुलार ना हो, वो कैसा परिवार? आज की स्थिती देखकर तो यह लगता है कि या तो परिवार शब्द इक्कीसवी सदी के लोगो की संकीर्ण मानसिकता का शिकार हो गया | या फिर हमारे पूर्वजो ने भारत सरकार के द्वारा संचालित "परिवार नियोजन" योजना को ज्यादा गंभीरता से ले लिया, और पुरे परिवार का ही नियोजन कर दिया | और मेरा मानना है कि संयुक्त परिवार ही आदर्श परिवार है, और आज के समाज की आवश्यकता है की संयुक्त परिवारकी प…

मेरा गाँव

मेरा गाँव मोहनपुर, कालीन नगरी भदोही जनपद क एक छूता सा गाँव है, क्षेत्रफल की दृष्टी से यह बदतो नहीं है, लेकिन जनसँख्या की दृष्टी से बड़ा है | लेकिन आब नहीं रहा क्योकी आधी से ज्यादा आबादी तो रोजगार की आशा में मुंबई जैसे महानगरो की और पलायन कर चुका है | गाँव के बीचोबीच ही सारी आबादी बसी हुई है और चारो तरफ खेत-खलिहान ऐसे लगते है मानो खुले आसमान के बिच सूरज अपनी छठा बिखेर रहा हो | बाग़-बगीचो के नाम पर कई है, जहाँ अब भी गर्मी के मौसम में आम के पेड़ के निचे कई बच्चे जमा हो जाते है, और दोपहर तो वही ख़त्म होती है | हमारा गाँव भी भारत की ही तरह आर्थीक विषमता का शिकार है, कई धन-धान्य से संपन्न है तो कई रोज कुआँ खोदे तभी पानी मिलता है | सभी आपस में मिलजुलकर रहते है, हमेशा प्रसन्न होते है, दुखी भी होते है तो एक नहीं कई लोग सथ देने को खड़े मिलते है, कभी किसी के यहाँ कुछ भी कार्यक्रम का आयोजन हुआ तो गाँव के बुजुर्ग वहां कार्यक्रम का संचालन बिना सकोच के इस भाव से करते है की इस कार्यक्रम की सारी जिम्मेदारी उन्ही के कंधो पर है| इतना ही नहीं तख़्त, कंडाल (पानी भरने वाले बर्तन), बर्तन और अन्य सामान देकर एक दु…