Friday, November 6, 2015

मेरे दादाजी

मेरा पूरा गाँव मेरे परीवार के प्रत्येक सदस्य को सम्मान की दृष्टी से देखता था, अभी भी वह सम्मान बरकरार है या नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है | लेकिन जो सम्मान मुझे भी मिलता आया है उसे मै अपनी बड़ी उपलब्धी मानता आया हूँ, (संभवतः अब यह भ्रम टूट गया है)| गाँव में सभी अपनो से बड़ो या छोटो को भी जिन्हें सम्मान देना होता है उसे "पालागी" (इस शब्द को मै अभी तक नमस्ते का समानार्थी शब्द मानता आया हूँ, लेकिन शायद इस शब्द का अर्थ निकलना मेरी सबसे बड़ी भूल होगी) कहकर संबोधित करते है | मेरे दादाजी जो उस समय ग्राम प्रधान थे जब मै पैदा भी नहीं हुआ था, उन्हें पुरे गाँव बहूत सम्मान की दृष्टी से देखता था, मेरा भ्रम भी अब जाकर टूटा की गाँव वाले मुझे सम्मान देकर दादाजी के प्रती सम्मान प्रदर्शीत करते थे |
Post a Comment

मेरे मन की

मेरी पहली पुस्तक "मेरे मन की" की प्रिंटींग का काम पूरा हो चुका है | और यह पुस्तक बुक स्टोर पर आ चुकी है| आप सब ऑनलाइन गाथा ...