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गुरुवार, 28 अक्टूबर 2021

Chunav Aa Gaya / चुनाव आ गया / Election Has Arrived

Chunav Aa Gaya / चुनाव आ गया (Election Has Arrived)


Chunav Aa Gaya / चुनाव आ गया (Election Has Arrived)



घनश्याम बाहर बैठकर महीने का हिसाब ठीक कर रहा था की कही से खेलकर आते हुए उनके आठ वर्षीय बेटे गुड्डू ने पास आकर पुछा - "पापा! क्या कोई त्यौहार आने वाला है?"

पापा ने कुछ सोचकर बोला - "नहीं तो|"

फिर गुड्डू ने पूछा - "आजकल गाँव में सभी खुश है क्योकी रोज कोई सफेद कपड़े पहने अंकल आते है, सभी के घर जाकर उनसे बाते करते है और अनाज, कपडे, मिठाइयाँ और पैसे भेट में देते है| अपने घर भी आये थे मुझे मिठाई का एक डिब्बा दिया और आपके बारे में पूछ रहे थे| दादी के पैर भी छुए और चले गए | आज फिर वैसे ही कपडे पहने दुसरे व्यक्ती गाँव में आये हुए है और कम्बल बाट रहे है |"


और इतना कहकर घनश्याम किसी गहरी सोच में डूब गए और गुड्डू ने ना समझते हुए भी संतुष्ट होने का बहाना किया जैसे सब कुछ समझ गया हो |


@ ऋषभ शुक्ला


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बुधवार, 27 अक्टूबर 2021

Mera Parivar / मेरा परिवार (My Family)

Mera Parivar / मेरा परिवार (My Family)


Mera Parivar / मेरा परिवार (My Family)



आज बात करूंगा परिवार के कुछ सदस्यों के बारे में जिन्हें मै चाहकर भी भुला नहीं सकता मेरा परिवार जिसमे मै भारत देश की एकता और अखंडता को वीद्दमान पाता हूँ, मेरा परिवार एक संयुक्त परिवार है जो भारत में ख़त्म होने की कगार पर है, और मै भारत वर्ष के लोगो से इसके संरक्षण हेतु आगे आने का आह्वान करता हूँ | मेरे तीन दादाजी और उनका पूरा परिवार, हम सभी एक साथ एक ही घर में रहते है | और शायद इसे एकीकृत और संयुक्त परिवारों के लिए ही हमारे पुर्वाजो ने परिवार शब्द का इस्तेमाल किया था| लेकिन शायद अब सभी परिवार शब्द के मूल आर्थ को ही भूल गएँ है, अरे जिस परिवार में दादा-दादी का प्यार, चाचा-चाची और अन्य सदस्यो का दुलार ना हो, वो कैसा परिवार? आज की स्थिती देखकर तो यह लगता है कि या तो परिवार शब्द इक्कीसवी सदी के लोगो की संकीर्ण मानसिकता का शिकार हो गया | या फिर हमारे पूर्वजो ने भारत सरकार के द्वारा संचालित "परिवार नियोजन" योजना को ज्यादा गंभीरता से ले लिया, और पुरे परिवार का ही नियोजन कर दिया | और मेरा मानना है कि संयुक्त परिवार ही आदर्श परिवार है, और आज के समाज की आवश्यकता है की संयुक्त परिवारकी पद्धती को बढ़ावा देना चाहिए | 
इसी के साथ अपनी बात ख़त्म करता  हूँ, कल मिलूंगा कुछ नए छुए, अनछुए पहलू को लेकर|

शुभ रात्री| धन्यवाद|

@ ऋषभ शुक्ला


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शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

Mera Gaon / मेरा गाँव (My Village)


Mera Gaon / मेरा गाँव (My Village)


मेरा गाँव मोहनपुर, कालीन नगरी भदोही जनपद का एक छोटा सा गाँव है, क्षेत्रफल की दृष्टी से यह बड़ा तो नहीं है, लेकिन जनसँख्या की दृष्टी से बड़ा है | लेकिन अब नहीं रहा, क्योकी आधी से ज्यादा आबादी तो रोजगार की आशा में मुंबई जैसे महानगरो की ओर पलायन कर चुका है | गाँव के बीचोबीच ही सारी आबादी बसी हुई है और चारो तरफ खेत-खलिहान ऐसे लगते है मानो खुले आसमान के बिच सूरज अपनी छठा बिखेर रहा हो | बाग़-बगीचो के नाम पर कई है, जहाँ अब भी गर्मी के मौसम में आम के पेड़ के निचे कई बच्चे जमा हो जाते है, और दोपहर तो वही ख़त्म होती है | हमारा गाँव भी भारत की ही तरह आर्थीक विषमता का शिकार है, कई धन-धान्य से संपन्न है तो कई रोज कुआँ खोदे तभी पानी मिलता है | सभी आपस में मिलजुलकर रहते है, हमेशा प्रसन्न होते है, दुखी भी होते है तो एक नहीं कई लोग सथ देने को खड़े मिलते है, कभी किसी के यहाँ कुछ भी कार्यक्रम का आयोजन हुआ तो गाँव के बुजुर्ग वहां कार्यक्रम का संचालन बिना सकोच के इस भाव से करते है की इस कार्यक्रम की सारी जिम्मेदारी उन्ही के कंधो पर है| इतना ही नहीं तख़्त, कंडाल (पानी भरने वाले बर्तन), बर्तन और अन्य सामान देकर एक दुसरे की मदद करते है | किसी के घर शादी के समय अगर मेहमान ज्यादा हो गए तो वे पड़ोसी के घर चले जाते है, और उस मेहमान का सत्कार उसी तरह होता है, जैसे अपने मेहमान का सत्कार करते है |  बस, संक्षेप में इतना ही कह सकता हूँ, कि मेरा गाँव अनेकता में एकता का जीता जागता उदाहरण है |
फिर मिलूंगा कुछ बीती बातो के साथ, जिन्हें याद करना एक सुखद अनुभव है |

धन्यवाद| शुभ रात्री|

@ ऋषभ शुक्ला


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गुरुवार, 13 मई 2021

Mere Bare Mein / मेरे बारे में / About Me


Mere Bare Mein.... / मेरे बारे में.... (About Me)


Mere Bare Mein / मेरे बारे में / About Me


मै ........., छोड़िये भी | यहाँ, मेरे नाम से कोई फर्क नहीं पड़ताक्योंकि यह अधिक प्रभावशाली  नहीं है |
मैंने अपने जीवन के २० वर्ष पूरे कर लिए है | मैं  भदोही से हूँ, जो पूरी दुनिया में अपने वस्त्र निर्यात के लिए जाना जाता है। मेरे पास अपने बारे में बताने के लिए कोई और अधिक सामग्री नहीं है, क्योकी मै अभी खुद को भी अच्छी तरह से कोशिश कर रहा हूँ, और यह कोशिश ताउम्र चलाती रहेगी | मेरा जन्म सन 1993 की 17 जुलाई को हुआ। मेरा 40 से अधिक सदस्यों का एक संयुक्त परिवार है। मेरे परिवार के ज्यादातर सदस्य घर में ही रहते हैं। लेकिन, मैं पिछले 2 से 3 साल अपने चाचा के साथ मुंबई में रहता हूँ। मैंने सन 2014 में कानपुर विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई अंग्रेजी साहित्य से पूरी की | मैं मेरे वित्तीय कारणों से अपना अध्ययन जारी नहीं रख सका। मेरे पिता एक संतुष्ट इंसान है और जिन्दगी को अपनी शर्तो पर जीने वाले इंसान है | मेरी माँ जो बहूत ही नेकदिल और बेइंतहा प्यार करने वाली महिला है, उन्होंने हमारे लिए, हमारी खुशियों के लिए अपनी करोणों इच्छाओं का गला घोट दिया | वह हमेशा खुश दिखने की कोशिश में रहती है, लेकिन उन्हें डर है की कोई उनकी आँखों में छुपे दर्द को देख ना ले | मेरे दादाजी जो मुझे सबसे ज्यादा समझाने और प्यार करने वाले इंसान थे | वही एक ऐसे व्यक्ती है जिनसे मै सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ हूँ और उन्ही के जैसा बनना ही मेरी जिन्दगी का मकसद है, और कोई ऐसा नहीं है जिसे मै समझता हूँ और जहां तक मेरा मानना है कोई भी मुझे नहीं समझता है | फिर मिलूंगा अगले पड़ाव पर जहां मै कोशिश करूंगा जिन्दगी को अपनी नजरो से देखने की |

धन्यवाद |

ऋषभ शुक्ला

Mere Man Kee / मेरे मन की


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गुरुवार, 17 सितंबर 2020

Meri Jindagi...Ek Kahani / मेरी जिंदगी...एक कहानी / My Life...A Story


Meri-Jindagi-Ek-Kahani-My-Life-A-Story

Meri Jindagi...Ek Kahani / मेरी जिंदगी...एक कहानी / My Life...A Story


मेरा नाम …………. छोड़ो भी, मेरे नाम मे क्या रखा है. कहते है लोगो को एक नाम इसीलिए दिए जाते है की वो रहे या ना रहे उन्हे हमेशा पहचाना जा सके, लेकिन फिर भी मै चाहता हूँ, की मेरा नाम एक गुमनाम शक्सियत हो. अब मै आप सभी को रूबरू करने जा रहा हूँ अपने इस अधूरे जिंदगी के सफ़र के बारे मे. मै शुरुआत करना चाहूँगा अपने जन्म से, अपने जन्म स्थान से, मेरी मातृभूमि से जिसकी एक झलक देखने भर के लिए मै हमेशा लालायित हुआ करता हूँ. मै बताना चाहूँगा जिंदगी के हर उस पड़ाव के बारे मे जो अभी भी मेरे दिल के पास है और जिसे मै कभी भी नही भूल सकता हूँ. बताना चाहूँगा मेरे जिंदगी के हर उस किरदार के बारे मे जिसने मेरे दिल को छू लिया, हर उस लम्हे के बारे मे जिसे मै कभी भी भूल नही पाऊँगा. बताना चाहूँगा मेरे गाँवो, मेरे कस्बे और उन गलियों के बारे मे जहा मै खेलकर बड़ा हुआ, जहा मैने अपनो का प्यार पाया, जहा मुझे मेरे पहले दोस्त मिले, उस मिट्टी के बारे मे जिसकी सोधी महक मे है एक अपनेपन का एहसास, एक सुकून, एक मिठास. बताना चाहूँगा अपनी जिंदगी के हर उस पड़ाव के बारे मे, जब मेरी जिंदगी बदली, बताना चाहूँगा हर उस व्यक्ति के बारे मे जो मेरे इस सुनहरे सफ़र पर मेरे साथ थे. मै बताना चाहूँगा कुछ एक ऐसी चाहकर भी ना भालने वाली घटनाओ के बारे मे, जिसे यादकर आज भी मेरी रूह ककप जाती है. आइए मेरे साथ मेरे जिंदगी के इस सुनहरे सफ़र पर, जहाँ हमेशा होंगी कुछ खट्टी, कुछ मीठी बातें. ........... मेरे मन की |

ऋषभ शुक्ला

मेरे मन की / Mere Man Kee


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बुधवार, 16 सितंबर 2020

Rashtrapati Chunav / राष्ट्रपती चुनाव / President Election

Rashtrapati Chunav / राष्ट्रपती चुनाव / President Election


शुभ संध्या मित्रो,

काफी खीचतान के बाद ही सही, लेकिन राम नाथ कोविंद जी भारत देश के प्रथम व्यक्ती चुने गए| देश को इससे कितना फायदा होगा| फायदा तो होगा, जरूर होगा, लेकिन अगर कोविंद जी बिना, किसी खीचतान के राष्ट्रपती चुन लिए गए होते| इस देश का सबसे में जो कुछ भी होता है, जाती और धर्म पर ही शुरू होता है और उसी पर ख़त्म| चाहे वो गाव के सरपंच के लिए चुनाव हो या प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव हो| मन की इसी विभीन्न जातीय और धार्मिक विविधताओं के लिए भारत वर्ष विश्व विख्यात है, लेकिन अब यही हमारे लिए जी का जंजाल बन चुका है| अब राष्ट्रपती चुनाव को ही ले लीजिये, भाजपा के पास राष्ट्रपती पद के लिए कई उपयुक्त दावेदार थे| और मीडीया ने तो चुन भी लिया था, लेकिन तभी, भाजपा ने जातीय ट्रंप कार्ड खेलकर कांग्रेस सहित कई विपक्षी पार्टियों को चारो खाने चित्त कर दिया| अब कांग्रेस के पास दलित उम्मीदवार उतारने के अलावा कोई विकल्प बचा ही नहीं| तो उन्होंने भी पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को मैदान में उतारकर, इसे राष्ट्रपती चुनाव से दलित और सर्वश्रेष्ठ दलित का चुनाव बना दिया| और ऐसा नहीं है यह पहली बार हुआ है या सिर्फ कांग्रेस ही जाति या धर्म की राजनिती करती है| बल्कि हमारे देश की सम्पूर्ण राजनिती जाति और धर्म से प्रेरित है| कभी यह हिन्दू - मुस्लिम, कभी सवर्ण - दलित औरज तो हद हो गयी, अब दलित और अधिक दलित के रूप में यह सामने आया है| जो भी है विरोध वैचारिक होना चाहिए, विरोध सही और गलत के बीच होना चाहिए, न की जाति और धर्म के नाम पर|

Rashtrapati-Chunav-President-Election

Rashtrapati Chunav / राष्ट्रपती चुनाव / President Election

एक माँ का पुत्र हूँ मै, एक की है देश,
एक ही है भेष मेराएक ही समाज है|

हम सब है एक भरत वंशज,
एक ही है धरती और एक ही आकाश है||

ऋषभ शुक्ला

मेरे मन की / Mere Man Kee


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मंगलवार, 15 सितंबर 2020

Tabele Me Hindu-Muslim / तबेले मे हिन्दू-मुस्लिम / Hindu-Muslim in Stable


Tabele-Me-Hindu-Muslim-Hindu-Muslim-in-Stable

Tabele Me Hindu-Muslim / तबेले मे हिन्दू-मुस्लिम / Hindu-Muslim in Stable

Tabele Me Hindu-Muslim / तबेले मे हिन्दू-मुस्लिम (Hindu-Muslim in Stable)

चर्चामंच: "हिन्दुस्तानियत से जिन्दा है कश्मीरियत" (चर्चा अंक-2668)



आज एक खास बातचीत के अंश आपके सामने रखने जा रहा हूँ|

मैं आज मनोज भाई के तबेले पर दूध लेने गया, तो मैने देखा काफी शोर-शराबा हो रहा था| मैने पास जाकर मनोज भाई से इसका कारण पूँछा, तो उन्होने बतलाया -  कुछ गायें-भैसे और बकरियाँ अनशन पर है|
मैने पूछा - क्यो भाई?
तो उन्होने कहा - क्या बताऊँ साहब, जबसे यह बैल (नेता) मेरे तबेले के पास रहने आया है, तभी से यह बवाल चल रहा है| इन्होने तो दूध देना ही बंद कर दिया है|

तो मैने आगे पूछा की इनकी मांगे क्या है|

तो उन्होने बतलाया की जो बकरीयाँ है, वो कह रही है की हमे गायों द्वारा गैर धर्म का कहकर अपमानित किया जा रहा है| हम तो सूखा गोबर करते है, लेकिन ये गायें हम पर गीला गोबर के छींटे मारती है| ये अपनी अधिक जनसंख्या के कारण आये दीन हम पर अत्याचार करती रहती है| हम कमजोर और लाचार है, हमे आरक्षण मिलने ही चाहिये हमे हप्ते मे एक दिन दूध न देने की परमीशन मिले| और उचित सुरक्षा मुहैया कराई जाये| जब तक हमारी मांगे पुरी नही होती, यह आन्दोलन चलता रहेगा|

उन्होने आगे कहा - आब गायों की समस्या भी सुन लीजिये, उनका कहना है की हम आपके तबेले में पहले से रहते आयें है, और अब ये दूसरे धर्म के लोग आकर हमारा अधिकार छीनना चाहते है| पहले सारा तबेला हमारा था, आज उन्होने आधे तबेले पर अतिक्रमण कर लिया है| पहले आप हमे ही प्यार से चारा खिलाते थे, अब आप उनको भी प्यार से चारा खिलाते हो| हम हमारे साथ अन्याय सहन नही करेंगे|  हम उच्च कोटी के जानवर है, लोग हमारा मूत्र तक पी जाते है, केलिन ये लोग यहाँ आकर गंदगी फैलाते है| इन्हे बाहर हटाया जाये, और हमे इनसे अच्छी सुविधायें दी जाये| नही तो यह आन्दोलन चलता रहेगा|

उन्होने फिर मुझसे पूछा - अब आप ही बताये हम क्या करें|

फिर मैने धीरे से दुध का बर्तन लिया और वापस घर की तरफ बढ चला|

तो मनोज ने पूछा - क्या हुआ आप चले क्यो जा रहे है| 

मैने कहा - एक यही तो बचे थे, राजनिती से, लेकिन जब राजनेताओं ने यहाँ भी धर्मांधता का बीज बो दिया, तो इनके से द्वेष की बदबू आनी तय है| 

ऋषभ शुक्ला

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सोमवार, 14 सितंबर 2020

Vishwa Chittha Diwas / विश्व चिट्ठा दिवस / World Blogger's Day

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Vishwa Chittha Diwas / विश्व चिट्ठा दिवस / World Blogger's Day

Vishwa Chittha Diwas / विश्व चिट्ठा दिवस (World Blogger's Day)


आप सभी को ब्लॉगर दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ|

ब्लॉग तो पहले भी लिखे जा रहे थे, लेकिन हिन्दी भाषा में ब्लॉगो के लिखे जाने की शुरुआत कुछ वर्ष पहले हुई| लेकिन शुरुवात मे हिन्दी प्रेमीयों के पढने का माध्यम या तो पुस्तकों को बनाते थे या पत्रिकाओं को| लेकिन धीरे-धीरे हिन्दी ब्लॉगो पर पाठको की संख्या मे असाधारण बढ़ोतरी ने हिन्दी लेखको को ब्लॉग लिखने के लिए प्रोत्साहित किया| और आज तो हिन्दी पाठको के लिये एक सशक्त माध्यम के रूप मे उभरा है हिन्दी ब्लॉगींग| और ब्लॉग से हिन्दी के दिन सुधरे, ना सुधरे लेकिन हिन्दी से ब्लॉगींग के दिन जरूर सुधरेंगे|

और हमारी तो यही विश्वास है कि हिन्दी चिट्ठा और चिट्ठाकार इसी तरह प्रगति करते रहे| सभी ब्लाग लेखको और पाठको को चिट्ठा दिवस की हार्दिक बधाई|

#हिंदी #ब्लॉग

ऋषभ शुक्ला

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रविवार, 13 सितंबर 2020

Mera Ghar-II / मेरा घर-II / My House-II


 Mera Ghar-II / मेरा घर-II / My House-II


नमस्कार मित्रो,

थोड़ी सी व्यस्तता के कारण चिट्ठे से अलविदा लिया था, लेकिन अभी मेरी कविता संग्रह "मेरे मन की" के प्रकाशित होने के उपरान्त लौट आया हू और अपनी यात्रा की शुरुवात वही से करता हू जहाँ से इसे छोड़ कर गया था|



पोस्ट क्रमांक - ६ -:- मेरा घर  से आगे ...


और आंगन के अंदर दो पेड़ थे। सबसे पहले अमरूद था और दूसरा आँवले का था। और, मवेशियों के लिए एक बड़ा खपरैल था, उस समय दो गायों और तीन भैंस थी जो उसी मे रहा करती थी| और एक चार कमरे की दालान थी, उनमें से तीन स्टोर रूम के रूप में इस्तेमाल किया गया था और एक का इस्तेमाल भूसे, उपले और लकड़ी के लिए रखने के लिये करते थे। और दालान के पीछे एक छोटी सी नदी थी, जो गर्मियो मे तो सुखी रहती थी, लेकिन बारिश मे पानी इकट्ठा हो जाता था| और उस पानी का उपयोग लोग अपने पशुओ को नहलाने, उनको पानी पिलाने, बर्तन-कपड़े इत्यादी धोने के काम मे लाते थे| घर के सामने एक गेस्ट रूम के नाम पर चारो तरफ से खुला हुआ खपरैल था जो एक बड़ी सी नीम के पेड़ के नीचे था| गर्मियो के दोपहर तो हम सभी लोग उसी खपरैल मे बिताते थे| और जो सुख और आनंद की अनुभूती उस खपरैल मे बैठकर मिलती थी, उसकी खोज वर्षो से कर रहा हूँ, लेकिन वैसा आनंद नही आया|

आज के लिये बस इतना ही, फिर मिलूँगा और इस यात्रा को आगे बढाऊँगा|
धन्यवाद, शुभ संध्या |

ऋषभ शुक्ला

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शनिवार, 12 सितंबर 2020

Mere Man Kee / मेरे मन की / Hindi Story and Poetry Book

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Mere Man Kee / मेरे मन की / Hindi Story and Poetry Book

Mere Man Kee / मेरे मन की (Hindi Story and Poetry Book)



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शुक्रिया


ऋषभ शुक्ला

मेरे मन की / Mere Man Kee


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बुधवार, 2 सितंबर 2020

Mera Ghar / मेरा घर / My House

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Mera Ghar / मेरा घर / My House


Mera Ghar / मेरा घर /My House


जैसा की मैंने आपको बताया, मेरा जन्म भदोही जिले के एक छोटे से गांव मोहनपुर में हुआ, जो बहुत ही सुंदर और प्रकृति से भरा है। मेरे गाँव की भौगोलिक संरचना कुछ ऐसी है की यह भदोही और इलाहबाद जिले के बिच में है | इलाहाबाद कुछ ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। यह जगह प्रयाग कुंभ मेला और कई  अन्य सांस्कृतिक विरासत अपने आप में समेटे हुए है | इसे हम तीन धार्मिक स्थानों की त्रिवेणी भी कह सकते है क्योकी हमारे निवास स्थान से प्रयाग नगरी इलाहबाद, बाबा विश्वनाथ धाम, काशी और माँ विंध्यवासिनी, मिर्जापुर की दूरी समान है, और हम इन महापावन स्थानों के केंद्र में बसते है, यह अपने आप में एक सुखदायक अनुभूती देने वाला है, हमारे आसपास तीन धार्मिक तीर्थस्थलो का संगम है | मेरा घर जो कुछ वर्षो पहले मिट्टी का था, अब कई बड़े कमरों  वाली कंक्रीट की एक बड़ी इमारत में तब्दील हो चुका है । लेकिन आज से दस वर्षो पूर्व में, तीन बड़े कमरों के साथ एक रसोईघर और एक स्नानघर था,  मेरा पूरा परीवार उसी घर में रहता था, घर में ही एक छतनुमा (जिसे हम वहां की भाषा में "कोठा" कहते थे) कमरा, जो भण्डारण हेतु उपयोग में लाया जाता था |  घर से बाहर की ओर आते समय एक बड़ा सा आँगन (जिसे हम ओसार कहते थे) था,  वह आँगन आज की तरह घुटन लिए हुए नहीं था, पुरी तरह से खुला हुआ था, ऊपर कोई छत नहीं थी, बस  उसके चारो ओर मिट्टी की एक ऊँची दीवार थी, जिससे बहार से कोई अन्दर देख ना सके|  आज भी वह सुख इन आरामदायक वातानुकूलित कमरों में भी हमें कभी नहीं मिला जो सुख हमें आँगन में मूंज से बनी हुई चारपाई में उस खुले आसमान के निचे खुले वातावरण में सोने पर मिलता था | आँगन में बांयी ओर एक अमरुद का पेड़ था, जिसके फल के स्वाद आज बाजार से लाये हुए फलो की तुलना में कई गुना मीठे और स्वादिष्ट हुआ करते थे | मै घर से निकलते ही आँगन में किसी को ना देख पेड़ पर चढ़ जाता था (क्योकी किसी सदस्य की मौजूदगी में ऐसा करना अपने लिए खतरे को बुलावा देने जैसा था), सिर्फ इस उम्मीद में की आज कोई पका हुआ फल खाने को मिलेगा, और पके हुए फल ना मिलने की दशा में भी कीसी अधपके फल को तोड़ लेते थे, उसका स्वाद इस तरह लेते थे, जैसे समुद्र मंथन के वक्त निकले पुरे अमृत इसी फल में समाये हो | उसके स्वाद में जो संतुष्टी थी, वो आज भी सफलता की उचाई पर चढ़ने के बाद भी नहीं है | लेकिन वह पेड़ जो वास्तव में सिर्फ एक पेड़ ना होकर हमारे परीवार का ही एक सदस्य था, हां, यह हो सकता है की बाकी सदस्य ऐसा ना भी मानते हो, लेकिन मै जब भी निराश या परेशान हुआ करता था, उसी पेड़ की टहनियों पर जाकर बैठ जाता था | और वह मुझे सांत्वना देती प्रतीत होती थी, एक माँ की भांती मुझे अपनी उस टहनी रूपी गोद में छुपा लेती थी | और मै उस पेड़ के सदस्य होने के कोई साक्ष्य तो नहीं दे सकता, या दलील नहीं दे सकता | लेकिन अगर आप उस नन्हे से बच्चे से दलील मांगेगे, जो बचपन में उसी की छाँव में खेला करता था, उसी के फल से अपनी भूख मिटाता था, और जिसके लिए वह पेड़ माँ सामान था, तो वह एक ऐसी कोशीश जरूर करेगा, और कहेगा - "घर में तो परीवार वाले ही रहते है, यह पेड़ भी तो घर में रहता है तो यह भी तो हमारे परीवार का एक सदस्य हुआ ना|" और सच ही तो कहा ना उस बच्चे ने | वह पेड़ हमारे परीवार सुख और दुःख दोनों समय हमारे साथ उसी तरह अटल खडा रहा, जैसे एक परीवार का सदस्य रहता | लेकिन किसे उस बच्चे की क़द्र थी, वही हुआ जो हमेशा से होता आया है | मानव रूपी दानव ने शहरीकरण की धुन में, आधुनिकता का हवाल देते हुए, उस मिट्टी के घर को अपने चकाचौंध सपनों तले रौद दिया, और उस पर अपने सपनो का महल खड़ा करना चाहा, जंहा अपनेपन जैसा कुछ भी न था | और मानवके उस स्वार्थ का शिकार हुआ वह पेड़ और वह बच्चा | उस विनाशकारी महल की शान हेतु जो बरामदा बनना था, उसके लिए उस पेड़ की बली जरूरी थी | उस बालक ने लाख कहा कि नहीं चाहिए उसे ऐसा बरामदा जो एक सजीव की जान ले ले, लेकिन उसकी आवाज को दबा दिया गया, और उसकी माँ की कब्र (उस पेड़) पर एक शानदार बरामदे का निर्माण कर दिया | आज लड़का भले ही बड़ा हो गया हो, क्या वह यह मंजर भूल पायेगा, जब उससे उसकी माँ उसके ही आँखों से सामने छीन ली गयी | वह लड़का तो आज भी निसहाय मानव के तांडव को देख रहा है, उस विनाश को देख रहा है, जो हरे-भरे गाँव को निगल ले रहा है, जो परीवार की खुशियाली को निगल ले रहा है | यह विकाश (विनाश) रूपी दानव इतना बड़ा हो चुका है की इसे ख़त्म करना असंभव सा लगता है, लेकिन बस सभी से प्रार्थना है की विकास किजीये लेकिन उस विकास से किसी बच्चे का बचपन ना छीने, किसी परीवार के टुकड़े ना हो, एक गाँव शहर (सहारा) ना बने | आज वही बच्चा अपनी माँ की ही कब्र पर बैठकर यह लेख लिख रहा है, और आज उसे यह दर सताने लगा है कि कही वह भी इसी विकास की दौड़ में चल पड़े | और जाने-अनजाने में किसी बच्चे से उसकी माँ छीन ले |


आज बस इतना ही, फिर मिलूंगा अपनी जिन्दगी के कुछ हिस्सों के साथ और कोशिश करूंगा उन्हें अपनी नजरो से देखने की, अगर आपने यह लेख पढ़ा हो तो अपने विचार जरूर लिखे |

धन्यवाद, शुभ संध्या |

ऋषभ शुक्ला

मेरे मन की / Mere Man Kee


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सोमवार, 31 अगस्त 2020

Mere Dadaji / मेरे दादाजी / My Grandfather

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Mere Dadaji / मेरे दादाजी / My Grandfather


Mere Dadaji / मेरे दादाजी (My Grandfather)


मेरा पूरा गाँव मेरे परीवार के प्रत्येक सदस्य को सम्मान की दृष्टी से देखता था, अभी भी वह सम्मान बरकरार है या नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है | लेकिन जो सम्मान मुझे भी मिलता आया है उसे मै अपनी बड़ी उपलब्धी मानता आया हूँ, (संभवतः अब यह भ्रम टूट गया है)| गाँव में सभी अपनो से बड़ो या छोटो को भी जिन्हें सम्मान देना होता है उसे "पालागी" (इस शब्द को मै अभी तक नमस्ते का समानार्थी शब्द मानता आया हूँ, लेकिन शायद इस शब्द का अर्थ निकलना मेरी सबसे बड़ी भूल होगी) कहकर संबोधित करते है | मेरे दादाजी जो उस समय ग्राम प्रधान थे जब मै पैदा भी नहीं हुआ था, उन्हें पुरे गाँव बहूत सम्मान की दृष्टी से देखता था, मेरा भ्रम भी अब जाकर टूटा की गाँव वाले मुझे सम्मान देकर दादाजी के प्रती सम्मान प्रदर्शीत करते थे |

ऋषभ शुक्ला

मेरे मन की / Mere Man Kee


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शनिवार, 8 अगस्त 2020

Jab Miya Bibi Raji, To Kya Karega Kazi / जब मियां बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी / When Mian Bibi agrees, what will Kazi do

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एक अनोखी प्रेम कहानी - Jab Miya Bibi Raji, To Kya Karega Kazi / जब मियां बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी / When Mian Bibi agrees, what will Kazi do

एक अनोखी प्रेम कहानी - Jab Miya Bibi Raji, To Kya Karega Kazi / जब मियां बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी / When Mian Bibi agrees, what will Kazi do



पहले तो वे कॉलेज में और कैंटीन में मिलते रहे, लेकिन जैसे-जैसे प्रेम गहरा होता गया, प्रेम सारी बंदिशे तोड़ आजाद हो गया | अब वे कभी किसी पार्क तो किसी होटल में मिलने लगे|  लेकिन कहते है ना - "इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपता|" धीरे-धीरे प्रयागराज कि प्रेम कहानी का रंग भदोही पर भी चढने लगा| जब दो जवां दिल सबसे बेखबर एक दुसरे के साथ आशियाना बसाने सपने बुन रहे थे, दोनों दुश्मनों को इसकी भनक लग गयी| 

सूरज के पिता श्यामा प्रताप शुक्ला और वैदेही के पिता सूर्यभान सिंह को जैसे ही यह ज्ञात हुआ दोनों गुस्से से आग-बबूला हो उठे| दोनों दुश्मनों कि आँखों में अपने ही रक्त को बहाने कि होड़ लग गयी| लेकिन इससे पहले कि वे दोनों उस प्रेम के अंकुर को रौंद पाते, वे चले गए अपने सपनो को पूरा करने और उन दोनों कि मदद कि सूरज कि बहन और वैदेही कि मित्र सुरभि ने|

सूरज और वैदेही ने प्रयागराज जंक्शन से ही ट्रेन पकड़ किया, और चल पड़े एक अनजाने डगर पर| दिल में एक अनिश्चितता का बीज लिए, एक अनचाहा डर लिए अपने दिल में, वे चले जा रहे थे| वे पहुँच चुके थे उस सपनो कि नगरी में, जहाँ जाते है सभी अपने मन में एक सपना लिए, लेकिन सपने सभी के पुरे नहीं होते ना ....

सूरज और वैदेही मुंबई पहुँच चुके थे, सूरज के दोस्त के घर जो किसी दवा कि कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर था| सूरज ने उसे बताया था कि उसने वैदेही से शादी कर ली है और वे दोनों अपने हनीमून पर आये है, कुछ दिनों में चले जायेंगे|

उधर गाँव में हडकंप मच चुका था, हर तरफ सूरज और वैदेही के घर से भाग जाने कि खबर आग कि तरह फैल गयी थी| हर घर में उन्ही दोनों कि चर्चा हो रही थी, हर गली, नुक्कड़ और चौराहे, हर दुकान पर आये प्रत्येक शख्स कि जुबान पर यही चर्चा थी| गाँव में यह खबर आम नहीं होती क्योकि ऐसी घटनाये रोज-रोज नहीं होती| हर प्रेमी कि प्रेम कहानी पूरी नहीं होती ना, बल्कि उनके प्रेम का गला घोंट दिया जाता है| लेकिन दो पंक्षी पिंजरे से उड़ चुके थे खुले असमान में|

उधर दोनों परिवार बहूत परेशान थे, परिवार के सदस्यों के चेहरे पर एक अजीब सी परेशानी,अनिश्चितता और डर कि रेखा थी कि अब क्या होगा? 

लेकिन कहते है ना कि - "जब मियां बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी|"

Ek Anokhi Prem Kahani / एक अनोखी प्रेम कहानी / An Extraordinary Love Story

जारी है ....


ऋषभ शुक्ला

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शनिवार, 1 अगस्त 2020

Ek Ladka, Ek Ladki / एक लड़का, एक लड़की / A Boy, A Girl

EK-LADKA-EK-LADKI

एक अनोखी प्रेम कहानी  - Ek Ladka, Ek Ladki / एक लड़का, एक लड़की / A Boy, A Girl


एक अनोखी प्रेम कहानी  - Ek Ladka, Ek Ladki / एक लड़का, एक लड़की / A Boy, A Girl


एक तरफ तो दोनों जमींदारो में दुश्मनी बढती जा रही थी, वही दूसरी ओर सुरभि शुक्ला और वैदेही सिंह कि दोस्ती भी गहरी होती जा रही थी| सुरभि वैसे तो अकेले ही कॉलेज जाया करती थी लेकिन कभी-कभी सूरज उसको छोड़ने जाता था| एक दिन जब सुरभि कॉलेज जाने को तैयार थी, तभी पीछे से सुरज ने कहा - "रुको सुरभि ! मै तुम्हारे कॉलेज कि ओर ही जा रहा हूँ तुम्हे छोड़ दूंगा|" 
अभी उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उनकी माँ सुषमा देवी बोल पड़ी - "पहले खाना खा लो उसके बाद जाओ|"
दोनों एक साथ बोल पड़े - "रास्ते में कुछ खा लेंगे|"

और दोनों निकल पड़े दोनों कॉलेज कि ओर ...

सूरज ने सुरभि को कॉलेज के गेट पर छोड़ दिया और फिर कही चला गया, लेकिन थोड़ी दूर जाने पर उसे याद आया - "मै अपना मोबाइल तो सुरभि के पास ही छोड़ आया|" 

और वो मोबाइल वापस लेने कॉलेज कि ओर लौटा, और सुरभि को ढूढते हुए लाइब्रेरी पँहुच गया, तो देखा कि सुरभि किसी के साथ बैठ कर पढाई कर रही थी, लेकिन जैसे ही सुरभि ने सूरज को देखा तो वो डर गयी, और वहां से उठकर तुरंत ही लाइब्रेरी से बाहर आ गयी लेकिन सूरज को समझ में आ गया कि सबकुछ ठीक नहीं है, क्योकि सुरभि और सूरज एक दुसरे को अच्छे से समझते थे| जब उसने सुरभि से पूंछा - "क्या हुआ ? बाहर क्यों आ गयी ? और वो लड़की कौन थी जो तुम्हारे साथ बैठी थी?"

सुरभि बोळी - "कुछ नहीं ! वो मेरी दोस्त है|"

और फिर वो मोबाइल देकर चली गयी लेकिन सुरज लगा कि कुछ गड़बड़ है और उसने उस लड़की के बारे में पता लगाया तो पूरी सच्चाई सामने आ गयी| 

वो तुरंत वापस कॉलेज आया| और सुरभि और वैदेही को बुलाकर दोनों को समझाते हुए कहा - "तुम दोनों एक साथ क्या कर रही हो, क्या तुम दोनों को नहीं पता कि हमारे परिवारों के बिच में कितनी दुश्मनी है? और हमारे बापों को पता चल गया तो दोनों एक दुसरे के खून के प्यासे हो जायेंगे|" 

तो दोनों बोल पड़ी - "हमारी दोस्ती तो ऐसे सौ दुश्मनी पर भारी है|" दोनों बेहद जिंदादिल थे, और दोनों को अपने बापों के रसूख और अकड़ से कोई मतलब नहीं था|"

और फिर तीनो मुस्कुराने लगे, और तीनो ने कैंटीन में बैठकर चाय पीया और ढेर सारी बात किया, और फिर घर चले गए| 

वैदेही और सुरज कि वही पहली मुलाकात थी, और दोनों ने पहली नजर में ही दोनों एक दुसरे को पसंद करने लगे|
सूरज को वैदेही का बिंदास अंदाज और खुले विचारो से और वैदेही को सूरज के सुलझे हुए होने के कारण प्रेम हो गया| 

और इस तरह एक दुसरे के खून के प्यासे परिवार एक दुसरे के करीब आते चले गए| और दो जवां दिल एक दुसरे के करीब आ गए और प्रेम परवान चढ़ता गया .....

जारी है ....


ऋषभ शुक्ला

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मेरे मन की

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