Monday, June 26, 2017

जिम कार्बेट नेशनल पार्क, नैनीताल, उत्तराखंड

सुप्रभात मित्रों,
स्वागत है आपका हमारे जीवन पथ पर|

अब मै आप सभी को अपने साथ नैनीताल, उत्तराखंड ले चल रहा हूँ, जहाँ कुछ महीने पहले मै दोस्तों के साथ घूमने गया था|
बात अप्रैल महीने की है, गर्मी चरम पर थी| अपने कुछ मित्रो के साथ मिलकर मैने कही जाने की योजना बनाई| लेकिन प्रश्न यह था कि जाया कहाँ जाये तो एक मित्र ने नैनीताल चलने का सुझाव दीया| तो हम सबने फटाफट रेल यात्रा के लिए वातानुकूलित डिब्बे के टिकट ले लिए और 21 से 24 तक के लिये "द ग्रैण्ड" मे वातानुकूलित कमरे भी बुक कर लिये| अब बस इन्तजार था 21 अप्रैल की शाम का जब हम नैनीताल के लिए रवाना होंगे|
और वह दीन भी आ गया, जब हमे नैनीताल के लिये निकलना था| हम 21 अप्रैल की दोपहर के तीन बजे एक हल्का सा बैकपैक लेकर और कुछ कपड़े, जरुरत के अन्य सामान और रास्ते के लिए खाना लेकर घर से विदा लिया| अपने छोटे भाई शिवम के साथ बाइक पर बरौत पहुँचा जहाँ से मुझे इलाहाबाद के लिये बस लेनी थी| बरौत से हमने बस ली और इलाहाबाद बस अड्डे पर पहुचे, और वहां से ऑटो रिक्शा लेकर इलाहाबाद जंक्शन पहुचे| वहाँ पहुचकर देखा तो पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार सारी मित्र मंडली पहले से उपस्थीत थी| वहां से शाम के 5:30 पर हमारी ट्रेन मुरादाबाद के लीये रवाना हुई| 



आगे की यात्रा के लिये आपसे फिर मिलूँगा|
धन्यवाद|

Wednesday, June 21, 2017

मेरा घर (पार्ट 2)

 नमस्कार मित्रो,

थोड़ी सी व्यस्तता के कारण चिट्ठे से अलविदा लियाथा, लेकिन अभी मेरी कविता संग्रह "मेरे मन की" के प्रकाशित होने के उपरान्त लौट आया हू और अपनी यात्रा की शुरुवात वही से करता हू जहाँ से इसे छोड़ कर गया था|



पोस्ट क्रमांक - ६ -:- मेरा घर  से आगे ...


और आंगन के अंदर दो पेड़ थे। सबसे पहले अमरूद था और दूसरा आँवले का था। और, मवेशियों के लिए एक बड़ा खपरैल था, उस समय दो गायों और तीन भैंस थी जो उसी मे रहा करती थी| और एक चार कमरे की दालान थी, उनमें से तीन स्टोर रूम के रूप में इस्तेमाल किया गया था और एक का इस्तेमाल भूसे, उपले और लकड़ी के लिए रखने के लिये करते थे। और दालान के पीछे एक छोटी सी नदी थी, जो गर्मियो मे तो सुखी रहती थी, लेकिन बारिश मे पानी इकट्ठा हो जाता था| और उस पानी का उपयोग लोग अपने पशुओ को नहलाने, उनको पानी पिलाने, बर्तन-कपड़े इत्यादी धोने के काम मे लाते थे| घर के सामने एक गेस्ट रूम के नाम पर चारो तरफ से खुला हुआ खपरैल था जो एक बड़ी सी नीम के पेड़ के नीचे था| गर्मियो के दोपहर तो हम सभी लोग उसी खपरैल मे बिताते थे| और जो सुख और आनंद की अनुभूती उस खपरैल मे बैठकर मिलती थी, उसकी खोज वर्षो से कर रहा हूँ, लेकिन वैसा आनंद नही आया|

आज के लिये बस इतना ही, फिर मिलूँगा और इस यात्रा को आगे बढाऊँगा|
शुभ रात्री मित्रो|

मेरे मन की

मेरी पहली पुस्तक "मेरे मन की" की प्रिंटींग का काम पूरा हो चुका है | और यह पुस्तक बुक स्टोर पर आ चुकी है| आप सब ऑनलाइन गाथा ...