"" Mere Man Kee: मोबाइल

Monday, September 3, 2018

मोबाइल

#Mobile


खाने की मेज सज चुकी थी लेकिन घर के किसी सदस्य का कोई पता न था, तभी प्रेम नाथ जी अपनी छड़ी लिए हुए कमरे से बाहर निकले और खाने की मेज के पास बैठ गए, और राम को सभी सदस्यों को बुलाने के लिए कहा| राम उनका नौकर लेकिन प्रेम नाथ जी के काफी करीब था|

थोड़ी देर बाद प्रेम नाथ जी के इकलौते बेटे कौशल नाथ का प्रवेश हुआ| अपने कोट को पहनते हुए खाने की टेबल पर बैठ गए, कौशल नाथ दिल्ली के नामी वकीलों में से एक है| और तभी उनकी पत्नी कौशल्या जी का प्रवेश हुआ| फिर कौशल नाथ के सुपुत्र आँखे मीजते हुए आते दिखे, प्रशांत .........प्रशांत नाम है उनका| चल रहे थे तो एक पैर कही पड़ते और दुसरे कही और, ऐसा लग रहा था जैसे भंग चढ़ा रखी हो| , और आँखे रक्त सी लाल मानो कई दिनों से सोया न हो, टेबल पर आकर बैठ गए|

यहाँ कुछ ऐसा सन्नाटा था जैसा युद्ध के बाद युद्ध स्थल का होता है , तभी प्रशांत ने चुप्पी तोड़ी - "डैड! मुझे कुछ पैसे चाहिए थे?"

कौशल नाथ जी ने तिरछी नजरो से देखकर पूछा ="क्यों?"

"मोबाइल खरीदना है|"

"अभी पिछले महीने ही तो लिया था|"

"हाँ! .....लेकिन अभी नया मॉडल आया है, और मुझे वो चाहिए|"

अभी कौशल नाथ जी इस हमले से उबरे नहीं थे तभी कौशल्या देवी ने भी अच्छा अवसर देखकर हमला बोल दिया - "मुझे भी नया मोबाइल लेना है, इसकी बैटरी चलती ही नहीं और ६ महीने हो चुके है|"

फिर एक अंतराल के उपरांत कौशल नाथ ने हल्की साँस छोड़ते हुए कहा - "मोबाइल तो मुझे लेना था, इस मोबाइल में तो कोर्ट के केस भी नहीं देख सकता, गुप्ता जी के पास तो एक अव्वल दर्जे का मोबाइल है, मै भी वही लेने की सोच रहा हूँ|"

अब तो प्रेम नाथ जी आपे से बाहर हो गए  - "ये क्या सबने मोबाइल-मोबाइल लगा रखा है, कोई और बात नहीं है क्या?"

अब सभी चुप हो गये थे खाना भी ख़त्म कर लिया था और सभी उठने को थे, लेकिन प्रेम नाथ जी के शब्दों ने सभी को जड़वत कर दिया - "बेटा! मै सोच रहा था कि ..... मै भी एक मोबाइल ले लू| क्या है की आजकल टहलते हुए वक्त का पता ही नहीं चलता और मित्रो से बात करनी हो तो तुम सब की राह देखनी होती है|"

जल्दी - जल्दी प्रेम नाथ जी अपनी बात ख़त्म कर अपने कमरे में चले गए| और उनके जाने के बाद सभी की नजरे कौशल नाथ के ऊपर थी| कौशल नाथ जी पहले तो विस्मित से थे लेकिन फिर मुस्कुराते हुए ऑफिस की ओर प्रस्थान किया|

और सोच रहे थे, कि पिताजी के हाथ में तो घड़ी होती है, इसलिए समय तो पता चला ही जाता है और रही बात मित्रो से बात करने की तो उनके कमरे रो भी फोन है और हॉल में भी|




आपका ब्लॉग पर आने के लिए आभार, हमारे मार्गदर्शन हेतु पुनः पधारें | क्योकी आपके आगमन से ही हमारे लेखन में उत्साह की वृद्धी होती है | धन्यवाद |

2 comments:

vibha rani Shrivastava said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 23 फरवरी 2019 को लिंक की जाएगी ....http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

मन की वीणा said...

सचमुच मजेदार बीमारी छूत जैसी।

मेरे मन की

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